Short Story - Harua - Emotional Story (Becteria and other Stories)

A story thumbnail highlighting caste discrimination, social evils and equality, with a message of unity and justice.

हरूआ (एक भावपूर्ण लघुकथा)- बैक्टीरिया व अन्य कहानियाँ

"अरे हरूआ जल्दी कर। सूट 'ए' खोल दे. बडे साहब आ गए हैं।" जब तक मैं अपने सूटकेस और अन्य सामान के साथ अधिकारी विश्राम गृह के बरामदे में पहुंचता, एक काला, लम्बा, हनुमान की कद-काठी का इंसान दौड़ कर आया और ताला खोलने लगा। वह सिर्फ कच्छा, बनियान पहने था। "जय हिन्द साब, मेरा नाम हरीराम है, लोग हरूआ कहते हैं। बरसों से इस रेस्ट हाउस का चौकीदार हूँ।" यह था मेरा पहला परिचय उस इंसान के साथ, जो इस एकान्त स्थान में मेरा सहचर होने जा रहा था। टुंडला के क्षेत्रीय प्रबंधक के पद पर नियुक्ति होने पर आज मैंने वहां पद ग्रहण कर लिया था। परिवार के बिना कुछ सूना सूना लगता था। रेलवे विभाग में अनेक अधिकारी थे, परन्तु सब अपने-अपने कार्य में व्यस्त रहते थे। मेरी सुबह और शाम रेस्ट हाउस में कोई पुस्तक पढ़ते या कुछ लिखते-लिखते बीत जाती थी। हरूआ समय से ठंडा पानी रख जाता था। गाड़ी साफ कर देता और कोई भी कार्य पड़ने पर तुरन्त अपने क्वार्टर से आ जाता था। रेस्ट हाउस के पिछले हिस्से में तीन-चार क्वार्टर बने थे, उन्हीं में से किसी एक में हरूआ अपने वृहत परिवार के साथ रह रहा था।

सब ठीक चल रहा था। अचानक एक दिन खाना बनाने वाला, जो मुसलमान लड़का था अपनी डयूटी पर नहीं आया। सुबह चाय न मिलने पर मैंने स्टेशन अधीक्षक और सहायक इंजीनियर को फोन किया तो पता चला कि रेस्ट हाउस का रसोईया असलम बीमार हो गया है और अन्य कोई इंतज़ाम शीघ्र कर दिया जाएगा। दोपहर को छोटे से टिफिन में खाना लेकर स्वयं सहायक इंजीनियर रेस्ट-हाउस आए और मेरे सामने ही हरूआ को बुलाकर खाना बनाने का निर्देश दिया। "कोई चिन्ता नहीं साहब, जब भी असलम छुट्टी जाता है. हरूआ खाना बनाता है खुशी से बनाता है क्योंकि इसे भी कुछ न कुछ मिल जाता है। नहीं तो अपनी वानर-सेना को कैसे पालेगा। हां साहब आठ बच्चे हैं इसके पाँच लडकियां और तीन लडके।" इतना कहकर सहायक इंजीनियर चले गए। मैं भी आश्वस्त हो गया कि शाम का खाना समय पर मिल जाएगा। हालांकि हरूआ के चेहरे पर छाया असंतोष मेरे आश्वस्त मन को कुछ चिंतित कर रहा था।

शाम को छः बजे चाय लेकर आया हरूआ खिन्न मन से एक तरफ खड़ा हो गया। चेहरे पर अनिच्छा और असंतुष्टि के भाव स्पष्ट नज़र आ रहे थे। "क्या बात है हरूआ। कुछ कहना चाहते हो क्या?" मेरे पूछते ही जैसे फट पड़ा हरूआ । मन का आक्रोश निकल पड़ा। "साब हमारा नाम है हरि राम, जात के कहार हैं हम। हमसे कहा गया है कि हम आपका खाना बनाएं। ये काम हमसे नहीं हो सकता साब। मिश्राजी बताये रहे कि आप जाति के जाटव हैं। जाटव तो हरिजन होते हैं न, किसी ब्राह्मण देवता का खाना बनाना हम धर्म समझते हैं, पर किसी हरिजन का खाना कैसे बनायें साब। क्या हम आपके झूठे बर्तन मांजकर अपना धर्म भ्रष्ट करें? साब, हम आपका खाना नहीं बना सकते। आप कोई और इंतज़ाम कर लें" कहते-कहते हरूआ के चेहरे पर घृणा और विद्रूपता का भाव छा गया। मेरे लिए हरूआ की यह प्रतिक्रिया अनपेक्षित नहीं थी। 21 वीं सदी में भी इंसान को जाति के आधार पर सम्मान देने के लिए भारतीय समाज शापित है। आने वाले सैंकड़ों वर्षों तक यही स्थिति रहेगी। हरूआ अपने क्वार्टर चला गया।

इसके पश्चात् मैं दो दिन के लिए बाहर चला गया। वापस आने पर एक-दो दिन रेलवे खान-पान का खाना खाता रहा। एक दिन सुबह असलम आ गया। हरूआ के व्यवहार से वह भी काफी दुखी हुआ। मेरे और हरूआ के संबंधों में भी एक रिक्तता सी आ गई थी। अब वह मिलता तो नमस्ते करता और बस यहीं विराम लग जाता। सब कुछ मंथर गति से चल रहा था। अचानक एक रात लगभग दस बजे असलम रात के खाने के बर्तन माजंकर अपने क्वार्टर जाने की तैयारी कर रहा था कि हरूआ के क्वार्टर से रोने-चिल्लाने की आवाज़ आने लगी। मैंने समझा हमेशा की तरह घरवाली को नियमित खुराक पिला रहा होगा। परन्तु ऐसा नहीं था। असलम दौड़कर आया और बताने लगा कि हरूआ को कोई बहुत खतरनाक बीमारी हो गई है। वह तड़प-तड़प कर रो रहा है। सभी बच्चे और उसकी पत्नी भी रो रहे हैं। मैं उसके क्वार्टर पहुंचा तो देखा कि हरूआ अपना पेट दबाकर असह्य पीडा से तडप रहा था। किसी करवट उसे चैन न था। पत्नी उसको पकड़कर रो रही थी और ढेर सारे बच्चे अपनी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं व्यक्त कर रहे थे। मैंने शीघ्र ही दफ्तर की जीप निकाली और असलम की मदद से हरूआ को लेकर अस्पताल चल पड़ा। रेलवे अस्पताल लगभग 3 कि.मी. दूर था। रेलवे डाक्टर ने सलाह दी कि शायद अपेंडिसाइटिस है। तुरन्त आपरेशन करना पड़ेगा और उसके लिए आगरा जाना पड़ेगा। ड्राईवर की प्रतीक्षा करना व्यर्थ था। हरूआ की जान संकट में थी। उसकी पत्नी रो-रोकर हलकान हो रही थी। मैं बिना सोचे समझे आगरा की तरफ जीप लेकर चल पड़ा। समय से आगरा पहुंचकर जिला अस्पताल में हरूआ को भर्ती कराया। एक मित्र की मदद से आर्थिक समस्या का भी समाधान हुआ और दो घंटे के अंदर हरूआ का अपेंडिसाइटिस का आपरेशन हो गया। सुबह 9 बजे जब हरूआ अस्पताल के बैड पर अपनी पत्नी के साथ बैठा था, मैं वापस टुंडला की तरफ चल पड़ा।

लगभग एक हफ्ते बाद हरूआ अपने क्वार्टर में आ गया। सुबह-शाम वह मुझे मिलता। हाथ जोड़कर नमस्ते करता, गीली आँखों और कंपकपाते जुड़े हाथों के साथ कुछ और कहने के लिए उसके होंठ फड़फड़ाते परन्तु इससे पहले कि वह कुछ कह पाता, मैं आगे निकल जाता। वह ठीक था, यही मेरे लिए प्रसन्नता की बात थी। मैं यह भी अनुभव कर रहा था कि मनुष्य की धन्यवाद ज्ञापित न कर पाने की मजबूरी उसे कितना दयनीय बना देती है। फिर एक दिन सुबह लगभग 9 बजे मैं दफ्तर जाने की तैयारी कर रहा था। ड्राईवर जीप लिए तैयार खड़ा था। मैं और मेरी पत्नी, जो आजकल मेरे पास आई हुई थीं, बरामदे में साथ बैठे थे कि हरूआ आकर खड़ा हो गया। उसके पीछे उसकी क्षीणकाय पत्नी भी आ गई थी। नमस्ते के बाद हरूआ फिर से हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। वह कुछ बोल भी नहीं पा रहा था। उसे जैसे शब्द ही नहीं मिल रहे थे। "क्या बात है हरूआ। अब तो ठीक हो। डयूटी पर आ गए क्या?" मैंने बड़े प्यार से हरूआ से पूछा। हरूआ की ज़बान लड़खड़ाने लगी। आँखों में आँसू भर आए। लेकिन उसकी चुप्पी नहीं टूट सकी। शायद अपनी भावनाओं को प्रकट करने लिए, अशिक्षित, भोला-भाला इंसान शब्द ही नहीं ढूंढ पा रहा था। तभी उसकी क्षीणकाय स्त्री की अविश्वसनीय मजबूत आवाज मुझे सुनाई दी। "बोलता क्यों नहीं है अब। तब तो बड़ा हरिजन और ब्राह्मण पर भाषण देता था। अब क्या हो गया। कहां गए तुम्हारे मिश्रा जी। उस रात साहब न होते तो पता नहीं तुम्हारा क्या होता और तुम्हारे बाद मेरे बच्चों का क्या होता।" "स्त्री बिलख - बिलख कर रोने लगी। पत्नी ने दिलासा दी। कुछ शांत होने पर वह बोली, "साहब आज से आपका खाना यही बनायेगा। ये ही नहीं मैं भी जी-जान से आपकी सेवा करूंगी। कहता था साहब जाटव हैं। फिरोजाबाद से आगरा तक 51 गाँव जाटवों के हैं। सब तरह से मजबूत और दबंग हैं जाटव लोग। कभी किसी जाट या ठाकुर की हिम्मत नहीं हुई उनसे पंगा लेने की। परन्तु उन्होंने कभी किसी गरीब को नहीं सताया। सब गरीबों की मदद की है। साहब जबसे आए हैं, सबकी मदद करते हैं। अरे गरीब की क्या जात। वो तो एक ग्ररीब है। और हम क्या हैं, हमारी औकात क्या है? पिछले 10 साल से इस रेस्ट हाउस में खाना बना कर और छोटी सी तनख्वाह से इतना बड़ा कुनबा चलाते हैं। साहब इसे माफ करो और सेवा का मौका दो।" मानव चरित्र की क्षुद्र जानकारी के कारण एक बार फिर मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया था।

हरूआ ने मेरी सारी जिम्मेदारी संभाल ली थी। शीघ्र ही वह स्वस्थ हो गया था। वह मेरा खाना बनाता, कपड़े धोता, मेरा सभी काम खुशी-खुशी करता और उसकी पत्नी भी मेरी पत्नी से घुल-मिल गई थी। कई बार मैंने उसे अपनी पत्नी के साथ हंसते-बतियाते देखा था। रसोई का सारा काम दोनों मिलकर संभालते थे। जीवन फिर सामान्य गति से चलने लगा था।

हरूआ मुझे इतना प्यार करने लगा था कि वह मेरी बुराई तक नहीं सुन पाता था। बलिष्ठ बदन होने के नाते कोई उससे अचानक लड़ता भी नहीं था। मुझे लगभग हर हफ्ते दिल्ली या इलाहाबाद जाना पड़ता था। शाम की ट्रेन से वापस आता था। हमेशा ही वापसी 11 या 12 बजे रात को हो पाती थी। टुंडला स्टेशन से रेस्ट-हाउस, रेलवे ट्रैक के किनारे-किनारे जाकर लगभग 1 किलोमीटर की दूरी पर सुनसान जगह पर था। हरूआ हमेशा एक मोटा डंडा लेकर स्टेशन आ जाता था और मेरा सूटकेस लेकर मेरे साथ रेस्ट-हाउस आता था। "साब, आप नहीं जानते यहां के लौंडे बड़े बदमाश हैं। मैं साथ रहूंगा तो नज़दीक नहीं आएंगे।" मैं केवल हंसकर रह जाता। लेकिन उसका साथ रहना मुझे एक सुकून प्रदान करता था।

समय गुजरते देर नहीं लगती। मेरे ट्रांसफर आदेश आ गए थे। हरूआ दो दिन से गायब था। उसका पूरा परिवार उदास था। बच्चे जो अक्सर मेरे पास आते थे, अब दूर रहने लगे थे। न जाने कितनी बार उनको मैंने ढेर सारे आम, केले, जामुन खिलाए थे। मेरी पत्नी ने सभी बच्चों को और विशेषकर लड़कियों को नए कपड़े समय-समय पर सिलवा कर दिए थे। किशोर लड़कियां मेरी पत्नी को घेर लेती थी और उनके बदन पर फटे कपड़े मेरी पत्नी की नींद हराम कर देते थे। हरूआ की पत्नी ने मेरी पत्नी के साथ मिलकर सब कुछ पैक कर दिया था। था। मेरी जगह आने वाले अधिकारी भी आ गए थे। जाने की पूरी तैयारी हो चुकी थी। सारा स्टाफ रेस्ट हाउस में मौजूद था। परन्तु हरूआ न जाने कहां गायब था। शायद मेरे जाने से खुश होगा। अब एक हरिजन का खाना नहीं बनाना पड़ेगा उसे । नालायक, सामने भी तो नहीं आ रहा। शुरू से ऐसा ही था। मैं ही न जाने क्यों उसे अपना बैठा। खैर नौकरी में तो तबादले होते ही हैं। नई जगह, नए लोग। किस-किस के लिए रोता रहूंगा मैं। आज शाम की गाड़ी में सैलून लगाने का आदेश मैं दे चुका था। सामान सारा रख दिया गया। सब लोग स्टेशन पर आ गए थे। विशेषकर चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी दुखी थे। सारा सैलून फूलों से लदा था। लेकिन मेरी आँखें प्लेटफार्म के अन्त में रेस्ट हाउस की दिशा में देखे जा रही थीं। पत्नी को मेरी उत्कंठा पर हंसी आ रही थी। गाड़ी चलने का समय हो गया। अचानक एक आदमी दौड़कर गार्ड के पास पहुंचा और गाड़ी न चलाने की प्रार्थना की। "हरूआ आ रहा है भाई, एक मिनट रोको।" दूर एक लंबा, विशालकाय व्यक्ति एक हाथ में छोटा सा डिब्बा लिए दौड़ा चला आ रहा था। "साब जी, माफ करना। गांव में परसों गाय ब्याने वाली थी। बड़ी परेशानी हुई। डाक्टर को बुलाना पड़ा। गांव से अभी लौटा तो पता चला कि आप जा रहे हैं। साब इस डिब्बे में गाय का दूध है। मुझ गरीब के पास इससे अच्छा तोहफा नहीं है साब। मंजूर करें मालिक।" कहते कहते हरूआ रो पड़ा। पत्नी ने डिब्बा संभाल लिया। गाड़ी चल पड़ी। मैं देर तक प्लेटफार्म पर हाथ जोड़कर खड़े हरूआ को देखता रहा। फिर धीरे-धीरे सब कुछ आँखों से ओझल हो गया। शायद मेरी आँखें डबडबा आई थीं।

साभार:

यह लघु कथा श्री सुरेंद्र कुमार जाटव जी द्वारा लिखी गई पुस्तक "बैक्टीरिया व अन्य कहानियां" से ली गई है। वे भारतीय सिविल सेवा में IRTS अधिकारी रहे हैं और रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल के जज पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। सामाजिक कुरीतियों के प्रखर आलोचक, दो पुस्तकों के लेखक और सामाजिक असमानता के खिलाफ आंदोलनों में सक्रिय योगदानकर्ता हैं। 

उनके विचार आपको कैसे लगे? कृपया अपने कमेंट्स में साझा करें!


Click here to Read more Sponsered blogs on Focus360Blog

{
  "@context": "https://schema.org",
  "@type": "Article",
  "headline": "Short Story - Harua - (Becteria and other Stories)",
  "description": "Discover a powerful story exposing caste discrimination and social evils, promoting equality, humanity, dignity and a society free from prejudice.",
  "author": {
    "@type": "Person",
    "name": "Rajiv Dhiman"
  },
  "publisher": {
    "@type": "Organization",
    "name": "Focus360Blog",
    "logo": {
      "@type": "ImageObject",
      "url": "https://www.focus360blog.online/images/logo.png"
    }
  },
  "datePublished": "2026-11-05",
  "dateModified": "2026-11-05",
  "mainEntityOfPage": {
    "@type": "WebPage",
    "@id": "https://www.focus360blog.online/2026/11/short-story-harua-becteria-and-other.html"
  }
}
🏠
Telegram WhatsApp Join Us

 

Loading...

Post a Comment

Previous Post Next Post